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क्या ऐसे भी कोई रोता है , दीवारों से लग कर , घर की वीरानियां बताती है कि हुआ क्या है !

उसी को जीने का हक़ है इस ज़माने में , जो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए

तू सागर है प्यार का , तुझमें समाई हूँ मैं , बूँद बनकर ❣️

कपड़ो से तो सिर्फ पर्दा होता है , हिफाजत तो निगाहों से होती है ❣️

मुफ्त में नहीं सीखा उदासी में मुस्कुराने का हुनर , बदले में ज़िन्दगी की हर ख़ुशी तबाह की है 🍁🍁

हाथ की लकीरें भी कितनी शातिर हैं , कमबख्त मुट्ठी में हैं , लेकिन काबू में नहीं 🍁